Select Page

How to download LLB 1st Year Semester Performance of Contracts Notes

 

How to download LLB 1st Year Semester Performance of Contracts Notes:-  Hi Friends आज आप LLB Law of Contract 1 (16th Edition) Chapter 10 Performance of Contracts Notes Study Material Question Papers in Hindi English दोनों में पढ़ने जा रहे है जिन्हें हमने Free Online Papers Share किया है | BA LLB Chapter Wise and Topic Wise पढ़ने के लिए हमें कमेंट करे LLB PDF Download करने के लिए हमें कमेंट करे |

अध्याय 10 संविदाओं का पालन (PERFORMANCE OF CONTRACTS)

सामान्य नियम

विधि द्वारा प्रवर्तनीय करार को संविदा कहते हैं; अत: पक्षकार अपने उत्तरदायित्व से तब तक उन्मुक्त नहीं होते हैं जब तक कि संविदा का मोचन (discharge) नहीं हो जाता है। संविदा के मोचन का सबसे सामान्य ढंग यह है कि पक्षकार संविदा का पालन करें। भारतीय संविदा अधिनियम का अध्याय 4 संविदाओं के पालन से सम्बन्धित है। धारा 37 जो कि इस अध्याय की प्रथम धारा है, के अनुसार, किसी संविदा के पक्षकारों को अपनी क्रमागत प्रतिज्ञाओं का पालन, जब तक कि ऐसा पालन इस अधिनियम के या किसी अन्य विधि के अधीन अभिक्षम्य नहीं कर दिया गया है. या तो करना चाहिये या करने की पेशकश करनी चाहिये। अत: सामान्य नियम यह है कि पक्षकारों को अपनी क्रमागत प्रतिज्ञाओं का या तो पालन करना चाहिये या पालन करने की पेशकश करनी चाहिये। यह आवश्यक नहीं है कि इस सम्बन्ध में सदैव औपचारिक संविदा हो। यदि पत्रों आदि से कीमत तय हो जाती है तो औपचारिक करार के बिना भी माल प्रदाय करने पर; दूसरा पक्षकार तय कीमत देने को बाध्य होगा। उदाहरण के लिये मेसर्स डूमराँव इन्डस्ट्रीज प्राईवेट लि० बनाम बिहार राज्य (M/s Dumraon Industries Pvt. Ltd. V. State of Bihar)1 बिहार राज्य की ओर से लालटेनों के क्रय के लिये निविदायें (tenders) आमंत्रित किये गये। याचिकादाता ने 205 रुपये दर्जन की कीमत अपनी निविदा में दी। बाद में प्रौढ़ शिक्षा के निदेशक तथा याचिकादाता के मध्य पत्रों के आदान-प्रदान द्वारा 195 रुपये की कीमत तय हुई। याचिकादाता ने लालटेन प्रदाय की, यद्यपि पक्षकारों के मध्य कोई औपचारिक करार नहीं हआ था। राज्य की ओर से माल स्वीकार किया गया त भुगतान भी किया गया। बाद में राज्य की ओर से तर्क किया गया कि निम्नतम निविदा के आधार पर कीमत कम थी अतः उसी आधार पर कीमत देय होगी। इसके अतिरिक्त कोई औपचारिक करार नहीं हुआ था। अतः राज्य ने शेष कीमत देने से इन्कार कर दिया। प्रस्तुत याचिका शेष धन को प्राप्त करने के लिये की गई थी। उच्च न्यायालय ने याचिकादाता की याचिका को स्वीकार करते हुये उसके पक्ष में निर्णय दिया तथा बिहार राज्य को आदेश दिया कि वह याचिकादाता को शेष 80,000 रुपये का भुगतान करे। न्यायालय ने अपने निर्णय में कहा :

“Though the formal agreement may not have been entered between the parties still through the exchange of letters and after accepting the supply of the lanterns at the rate quoted by the petitioners company and making partial payment on the basis of the said claim, now it is too late for the State to say that they will be paying the price at a reduced rate as no formal agreement has been entered into till today.”?

परिस्थितियों के आधार पर न्यायालय यह धारित कर सकता है कि ब्याज चक्रवद्धि न होकर साधारण होगा।

परन्तु कुछ परिस्थितियों में पक्षकारों को अपनी प्रतिज्ञाओं के पालन से अभिक्षम्य किया जा सकता है, जैसे कि पालन की असम्भवता (impossibility of performance),4 उस सम्बन्ध में पक्षकारों के

1. ए० आई० आर० 1992 पटना 83.

2. तत्रैव, पृष्ठ 85.

3. मेसर्स ओ० एन० जी० सी० लि. बनाम ऐसोसियेशन आफ नेचुरल गैस कन्ज्यूमिंग इन्डस तथा अन्य, ए० आई० आर०

2004 एस० सी० 2327, 2329.

* आई० ए० एस० (1978) प्रश्न 3 (ङ) सी० एस० ई० (1990) प्रश्न 5 (स) के लिए भी देखें।

4. धारा 56.

करार द्वारा5 या संविदा के उल्लंघन द्वारा उन्मोचन से (Discharge by breach)6 या किसी अन्य विधि के उपबन्धों के अधीन।

प्रतिज्ञायें न केवल प्रतिज्ञाकर्ताओं वरन् उनके प्रतिनिधियों को भी बाध्य करती हैं। परन्तु यदि संविदा से इसके प्रतिकल आशय प्रतीत होता है, तो प्रतिनिधि बाध्य नहीं होते हैं। उदाहरण के लिए, क, ख को 1000 रुपये की देनगी पर एक निश्चित दिवस-विशेष को ख को वस्तुयें परिदत्त करने की प्रतिज्ञा करता है। क उस दिन से पहले ही मर जाता है। क के प्रतिनिधि ख को वस्तुयें परिदत्त करने के लिए बाध्य हैं और ख. क के प्रतिनिधियों को 1,000 रुपये देने के लिए बाध्य है परन्तु, यदि क एक कीमत-विशेष पर दिवसविशेष तक ख के लिए एक चित्र बनाने की प्रतिज्ञा करता है तथा क उस दिन से पहले ही मर जाता है, तो यह संविदा क के प्रतिनिधियों के द्वारा या ख के द्वारा प्रवर्तित नहीं करायी जा सकती, क्योंकि इस मामले में संविदा का आशय है कि चित्र केवल क द्वारा बनाया जाय।

धारा 37 में एक और महत्वपूर्ण बात नोट करने योग्य यह है कि पालन की पेशकश (Offer of Performance) को पालन के समतुल्य रखा गया है। इस नियम का कारण यह है कि यदि कोई पक्षकार पालन की पेशकश करता है, परन्तु दूसरा पक्षकार उसे स्वीकार नहीं करता है या उसे पालन नहीं करने देता है तो पालन की पेशकश करने वाला पक्षकार संविदा के अधीन अपने उत्तरदायित्व से उन्मुक्त हो जायगा। परन्तु इसके लिए धारा 38 में वर्णित शर्तों को पूरा करना आवश्यक है।

धारा 38 के अनुसार, जब कि किसी प्रतिज्ञाकर्ता ने प्रतिज्ञाग्रहीता से पालन की पेशकश की है और वह पेशकश प्रतिग्रहीत नहीं की गयी है तो प्रतिज्ञाकर्त्ता पालन न करने के लिए उत्तरदायी नहीं है और न ही वह संविदा के अधीन अपने अधिकारों को तद्द्वारा खो देता है। ऐसी प्रत्येक पेशकश को निम्नलिखित शर्ते पूर्ण करनी चाहिये-

(1) वह अशर्त (Unconditional) होनी चाहिये।

(2) वह उचित समय और स्थान पर तथा ऐसी परिस्थितियों के अधीन की जानी चाहिये कि उस व्यक्ति को, जिससे वह की गयी है, यह निश्चित करने का युक्तियुक्त अवसर हो कि वह व्यक्ति, जिसके द्वारा वह की गयी है, वहीं और उसी समय उस बात को, जिसे कि वह अपनी प्रतिज्ञा से करने को बाध्य है, पूर्णतया करने को समर्थ और रजामन्द है।

इस सम्बन्ध में अंग्रेजी वाद स्टार्टअप बनाम मैक्डानल्ड (Startup v. Macdonald)10 उल्लेखनीय है। इस वाद में वादी ने प्रतिवादी से कुछ टन तेल बेचने की संविदा की तथा यह वचन दिया कि उक्त तेल मार्च के अन्तिम 14 दिनों में परिदत्त कर देगा। उसने तेल परिदत्त करने की पेशक 31 मार्च (शनिवार) को 9 बजे रात को की, परन्तु प्रतिवादी ने उसे लेने से इन्कार कर दिया। न्यायालय ने धारित किया कि वादी ने संविदा के अधीन अपना उत्तरदायित्व पूरा कर दिया। इस प्रकार न्यायालय सामान्यतः इस शर्त के अनुपालन के विषय में बड़े उदार होते हैं।

(3) यदि वह पेशकश प्रतिज्ञाग्रहीता को कोई चीज परिदत्त करने के लिए है तो प्रतिज्ञाग्रहीता को यह देखने का युक्तियुक्त अवसर होना चाहिये कि पेशकश की गयी चीज वह चीज है जिसे परिदत्त करने के लिए प्रतिज्ञाकर्ता अपनी प्रतिज्ञा द्वारा बाध्य है। उदाहरण के लिए, क, ख को उसके गोदाम में एक विशिष्ट किस्म की रुई की 100 गाँठे 1873 की मार्च की पहली तारीख को परिदत्त करने की संविदा करता है। इस

5. धारा 62.

6. धारा 39.

7. धारा 37.

8. धारा 37 का दृष्टान्त (क)।

9. धारा 37 का दृष्टान्त (ख)।

10. (1843) 64 आर० आर० 810.

धारा में वर्णित प्रभाव के सहित पालन की पेशकश करने के उद्देश्य से क को वह रुई नियत दिन ख के गोदाम में ऐसी परिस्थितियों के अधीन लानी चाहिए कि ख को यह समाधान कर लेने का युक्तियुक्त अवसर हो कि पेशकश की गयी चीज संविदा की गयी किस्म की रुई है, उसकी 100 गाँठे हैं।11

जहाँ समान चीजों के लिये दो बार निविदा नोटिस जारी की गई है, पहली नोटिस के परिणामस्वरूप कोई संविदा नहीं की गई है, तो केवल यह तथ्य कि पेटीशनर ने सबसे कम मूल्य की निविदा दी थी उसे कोई अधिकार नहीं देगा जब नयी अर्थात दसरी निविदा लगभग एक वर्ष के पश्चात् जारी की गई है। निविदा चाहे सबसे कम मूल्य की क्यों न हो उसे सरकार अस्वीकार कर सकती है परन्तु सरकार को निविदाकर्ता को अस्वीकार करने के कारण संसूचित करने होंगे।13

किसी पक्षकार द्वारा प्रतिज्ञाओं का पूर्णत: पालन करने से इन्कार करने का प्रभाव-धारा 39 के अनुसार, जब संविदा का कोई पक्षकार अपने वचन (Promise) का पूर्णतः पालन करने से इन्कार कर देता है या पालन करने से अपने आपको असमर्थ कर लेता है तो वचनग्रहीता (Promisee) संविदा समाप्त करने का अधिकारी हो जाता है। परन्तु यदि वह शब्दों या आचरण से संविदा को जारी रखने की सम्मति देता है तो वह संविदा का अन्त नहीं कर सकता है। उदाहरण के लिए क, एक गीतकार, ख (जो एक थिएटर का मैनेजर है) से दो महीने की अवधि में सप्ताह में दो रातों को उसके थिएटर में गाने की संविदा करता है तथा ख उसे प्रति रात हेतु 100 रुपये देने का वचन देता है। छठीं रात क जानबूझ कर थिएटर में अनुपस्थित रहती है। ख संविदा को समाप्त कर सकता है।14 यदि क, ख की सम्मति से सातवीं रात को गाती है तो ख संविदा को समाप्त नहीं कर सकता है क्योंकि उसने संविदा को जारी रखने के लिए अपनी सम्मति प्रदान कर दी। परन्तु ख क से छठीं रात की अनुपस्थिति के लिए मुआवजा प्राप्त कर सकता है।15 इसी प्रकार, यदि निर्माण की संविदा में समय संविदा का सार उल्लिखित है तथा संविदा-निर्माण पूरा होने तक या उसे छोड़ देने तक ही प्रवर्तनीय है तथा यदि संविदा का एक पक्षकार उचित प्रकार से संविदा का विखण्डन (Rescission) करता है तथा इसके परिणामस्वरूप संविदा के निबन्धनों के अनुरूप जमानत (Security) जब्त कर लेता है तो यह वैध होगा।16

संविदा किसके द्वारा पालित की जानी चाहिये?*

(By whom contracts must be performed?)

(1) स्वयं प्रतिज्ञाकर्ता या उसके प्रतिनिधियों द्वारा-धारा 40 के अनुसार-

“यदि मामले के स्वरूप से यह प्रतीत हो कि किसी संविदा के पक्षकारों का यह आशय था कि उसमें अन्तर्विष्ट किसी प्रतिज्ञा का स्वयं प्रतिज्ञाकर्ता द्वारा पालन किया जाना चाहिये तो ऐसी प्रतिज्ञा प्रतिज्ञाकर्ता द्वारा पालन की जानी चाहिये। दूसरे मामलों में प्रतिज्ञाकर्ता या उसके प्रतिनिधि उसका पालन करने के लिए किसी सक्षम व्यक्ति को नियोजित कर सकेंगे।”

दृष्टान्त-धारा 40 में दिये गये निम्नलिखित दृष्टान्त भी उल्लेखनीय हैं

(क) क, ख को एक धनराशि देने की प्रतिज्ञा करता है। क इस प्रतिज्ञा का या तो ख को यह धन स्वयं देकर या उसे दूसरे के द्वारा ख को दिलवा कर पालन कर सकेगा, और यदि देनगी के

11. धारा 38 का दृष्टान्त ।

12. रेड रोज कोआपरेटिव लेबर एवं कान्सट्रक्शन (एल० ओ० सी०) लि. बनाम पंजाब राज्य, ए० आई० आर० 1999 पंजाब एवं हरियाणा 244, 245-246.

13. लैन्को कान्सट्रक्शन लि., हैदराबाद बनाम आन्ध्र प्रदेश सरकार, ए० आई० आर० 1999 आंध्र प्रदेश 371, 375-376.

14. धारा 39 का दृष्टान्त (क)।

15. धारा 39 का दृष्टान्त (ख)।

16. महाराष्ट्र राज्य बनाम दिगम्बर कलवन्त कुलकार्नी, ए० आई० आर० 1979 एस० सी० 1339, 1341.

* सी० एस० ई० (1990) प्रश्न 5 (स) के लिये भी देखें।

लिए नियत समय के पूर्व क मर जाये तो उसके प्रतिनिधियों को प्रतिज्ञा का पालन करना

चाहिये, या वैसा करने के लिए किसी उचित व्यक्ति को नियोजित करना चाहिये।

(ख) क, ख के लिए रंगचित्र बनाने की प्रतिज्ञा करता है। क को इस प्रतिज्ञा का पालन स्वयं करना

चाहिये।

अन्य व्यक्ति से पालन प्रतिग्रहीत करने का प्रभाव-जब कि प्रतिज्ञाग्रहीता किसी अन्य व्यक्ति से प्रतिज्ञा का पालन प्रतिग्रहीत करता है तो वह उसका पालन प्रतिज्ञाकर्ता से तत्पश्चात् नहीं करा सकता।17

(2) संयुक्त दायित्वों का न्यागमन (Devolution of Joint Liabilities)-जब दो या अधिक व्यक्तियों ने कोई संयुक्त प्रतिज्ञा की है, तब जब तक कि संविदा से प्रतिकूल आशय प्रतीत न हो, अपने संयुक्त जीवन के दौरान में ऐसे सब व्यक्तियों को उनमें से किसी की मृत्यु के तत्पश्चात् उत्तरजीवी या उत्तरजीवियों के साथ संयुक्तरूपेण उसके प्रतिनिधि को और अन्तिम उत्तरजीवी की मृत्यु के पश्चात् संयुक्तरूपेण प्रतिनिधियों को उस प्रतिज्ञा को पूरा करना चाहिये।18

धारा 42 में वर्णित उपर्युक्त उपबन्ध इंग्लैंड में प्रचलित विधि से भिन्न है। इंग्लैंड में संयुक्त प्रतिज्ञाकर्ताओं में से किसी की मृत्यु होने पर मृतक के प्रतिनिधियों के विरुद्ध अलग से या उत्तरजीवियों के साथ संयुक्त रूप से वाद नहीं चलाया जा सकता है।19 अतः इंग्लैंड में सम्पूर्ण विधिक उत्तरदायित्व प्रतिज्ञाकर्ताओं का होता है तथा उनकी मृत्यु पर उनके प्रतिनिधियों का होता है।20

संयुक्त कारबार की शर्तों एवं निबन्धनों को लिखा नहीं गया है तो पक्षकारों का आचरण देखना कि कारोबार के चलाने में कैसा व्यवहार किया तत्संगत होगा। संयुक्त अनुक्रम में पक्षकारों का अंश पक्षकारों के आचरण के अनुसार निर्धारित किया जाना चाहिये। यह निर्णय उच्चतम न्यायालय ने गमानी अनासूया बनाम पार्वतनी अमरेन्द्र चौधरी (Gammani Anasuya v. Parvatini Amrendra Choudhary),21 के वाद में दिया था। __

(3) संयुक्त प्रतिज्ञाकर्ताओं में से कोई एक पालन के लिए बाध्य किया जा सकता है-धारा 43 के अनुसार

“जब कि दो या अधिक व्यक्ति कोई संयुक्त प्रतिज्ञा करते हैं तब प्रतिज्ञाग्रहीता, ऐसे संयुक्त प्रतिज्ञाकर्ताओं में से किसी एक या अधिक को पूर्ण प्रतिज्ञा के पालन के लिए, उसके प्रतिकूल अभिव्यक्त करार की अनुपस्थिति में, मजबूर कर सकेगा।”

उदाहरण के लिए, क, ख और ग संयुक्त रूप से घ को 3,000 रुपये देने की प्रतिज्ञा करते हैं। घ या तो क या ख या ग को मजबूर कर सकेगा कि वह घ को 3,000 रुपये दे।22

दो या अधिक संयुक्त प्रतिज्ञाकर्ताओं में से प्रत्येक अन्य संयुक्त प्रतिज्ञाकर्ता को जब तक कि संविदा से प्रतिकूल आशय प्रतीत न हो, प्रतिज्ञा के पालन के अपने साथ समानरूपेण अंशदान करने के लिए प्रत्येक प्रतिज्ञाकर्ता मजबूर कर सकेगा। इसके अतिरिक्त यदि दो या अधिक संयुक्त प्रतिज्ञाकर्ताओं में से कोई एक ऐसा अंशदान करने में चक करता है तो शेष संयुक्त प्रतिज्ञाकर्ताओं को ऐसी चूक से पैदा होने वाली हानि को समान अंशों में सहन करना पड़ेगा।23 परन्तु जैसा कि धारा 43 के स्पष्टीकरण (Explanation) में स्पष्ट किया गया है कि इस धारा की बात मूलऋणी की ओर से प्रतिभू द्वारा की गई देनगियों को अपने मूलऋणी से प्रत्युद्धरित करने से उस प्रतिभू को निवारित नहीं करेगी या मूलऋणी द्वारा की गयी देनगियों, लेखे उस प्रतिभू से कोई चीज प्रत्युद्धरित करने के उस मूलऋणी को हकदार नहीं बनायेगी।

17. धारा 41.

18. धारा 42

19. लीक, आठवाँ संस्करण, पृष्ठ 313.

20. देखें : पोलक ऐण्ड मुल्ला, इण्डियन कान्ट्रैक्ट ऐक्ट ऐण्ड स्पेसिफिक रिलीफ ऐक्ट नवाँ संस्करण, (1972) पृष्ठ 363.

21. ए० आई० आर० 2007 एस०सी० 2380, 2384.

22. धारा 43 का दृष्टान्त (क)।

23. धारा 43.

दृष्टान्त-(1) क, ख और ग संयुक्त रूप से घ को 3,000 रुपये देने की प्रतिज्ञा करते हैं। ग पूर्ण राशि देने के लिए मजबूर किया जाता है। क दिवालिया है, किन्तु उसकी आस्तियाँ (Assets) उसके ऋणों के आधे को चुकाने के लिए पर्याप्त हैं, ग क की सम्पदा से 500 रुपये और ख से 1,250 रुपये पाने का हकदार

है।24

(2) क, ख और ग, घ को 3,000 रुपये देने की संयुक्त प्रतिज्ञा के अधीन हैं। ग कुछ भी देने के लिए असमर्थ है और क पूर्ण राशि देने के लिए मजबूर किया जाता है। क, ख से 1,500 रुपये पाने का हकदार है।25

(3) क, ख और ग घ को 3,000 रुपये देने की संयुक्त प्रतिज्ञा के अधीन हैं। क और ख, ग के लिए प्रतिभू मात्र हैं। ग रुपया चुकाने में असफल रहता है। क और ख पूर्ण राशि देने के लिए मजबूर किये जाते हैं, वे उसे ग से प्रत्युद्धरित करने के हकदार हैं।26

एक संयुक्त प्रतिज्ञाकर्ता के सम्मोचन का प्रभाव (Effect of release of one joint promisor)-जहाँ कि दो या अधिक व्यक्तियों ने एक संयुक्त प्रतिज्ञा की है, वहाँ प्रतिज्ञाग्रहीता द्वारा ऐसे संयुक्त प्रतिज्ञाकर्ताओं में से एक का सम्मोचन अन्य संयुक्त प्रतिज्ञाकर्ता या संयुक्त प्रतिज्ञाकर्ताओं को उन्मुक्त नहीं करता, न वह इस प्रकार सम्मोचित संयुक्त प्रतिज्ञाकर्ता को अन्य संयुक्त प्रतिज्ञाकर्ताओं के प्रति उत्तरदायित्व से ही मुक्त करता है।27

संयुक्त अधिकारों का न्यागमन (Devolution of Joint Right)-धारा 45 के अनुसार-

“जब किसी व्यक्ति ने दो या अधिक व्यक्तियों से संयुक्तरूपेण प्रतिज्ञा की है, तब जब कि संविदा से प्रतिकूल आशय न हो, उसके पालन के दावे का अधिकार, जहाँ तक कि उसका और उनका सम्बन्ध है, उनके संयुक्त जीवनों के दौरान उनका, और उनमें से किसी की मृत्यु के पश्चात् उत्तरजीवी या उत्तरजीवियों के साथ पूर्णरूपेण ऐसे मृत व्यक्तियों के प्रतिनिधि का अन्तिम उत्तरजीवी की मृत्यु के पश्चात् संयुक्तरूपेण सबके प्रतिनिधियों का होता है।”

उदाहरण के लिए क, अपने को ख और ग द्वारा उधार दिये गये 5,000 रुपयों के प्रतिफलार्थ संयुक्तरूपेण ख और ग को वह राशि ब्याज समेत उल्लिखित दिन चुकाने की प्रतिज्ञा करता है। ख मर जाता है। पालन का दावा करने का अधिकार ग के जीवन के दौरान ग के साथ संयुक्तरूपेण ख के प्रतिनिधियों का, और ग की मृत्यु के पश्चात् संयुक्तरूपेण ख और ग के प्रतिनिधियों का है।28

पालन का समय तथा स्थान* (Time and Place for Performance)

(1) जहाँ कि पालन के लिए आवेदन न किया जाना हो और कोई समय उल्लिखित न हो-धारा 46 के अनुसार-

“जहाँ कि प्रतिज्ञाकर्ता को अपनी प्रतिज्ञा का पालन प्रतिज्ञाग्रहीता द्वारा आवेदन दिये जाने के बिना संविदा के अनुसार करना है और पालन के लिए कोई समय उल्लिखित नहीं है, वहाँ वचनबन्ध का पालन युक्तियुक्त समय के भीतर करना पड़ेगा।”

धारा 46 की व्याख्या में यह भी स्पष्ट किया गया है कि यह प्रश्न कि “युक्तियुक्त समय क्या है?” प्रत्येक अवस्था-विशेष में तथ्य का विषय है। अतः इस सम्बन्ध में पहले से ही कोई नियम निश्चित नहीं किया जा सकता है। प्रत्येक मामले में ‘युक्तियुक्त समय’ मामले के तथ्य, परिस्थितियों तथा संव्यवहार की प्रकृति पर निर्भर करेगा।29

24. धारा 43 का दृष्टान्त (ख)।

25. धारा 43 का दृष्टान्त (ग)।

26. धारा 43 का दृष्टान्त (घ)।

27. धारा 44.

28. धारा 45 का दृष्टान्त।

* सी० एस० ई० (1989) प्रश्न 5 (स) के लिए भी देखें।

29. देखें : हंगरफोर्ड ऐण्ड इन्वेस्टमेन्ट ट्रस्ट लि. बनाम हरीदास मुन्ध्रा, ए० आई० आर० 1975 एस० सी० 1826, 1833.

(2) जहाँ कि पालन के लिए समय उल्लिखित है और आवेदन नहीं किया जाता है-धारा 47 के अनुसार

“जब किसी प्रतिज्ञा का पालन निश्चित दिन किया जाना है और प्रतिज्ञाकर्ता ने प्रतिज्ञाग्रहीता द्वारा आवेदन किये जाने के बिना उसके पालन का वचन दिया है, तब करार में प्रायिक घण्टों के दौरान किसी समय ऐसे दिन और उस स्थान पर जिस पर कि उस प्रतिज्ञा का पालन किया जाना चाहिये, प्रतिज्ञाकर्ता उसका पालन कर सकेगा।”

उदाहरण के लिए, क प्रतिज्ञा करता है कि वह पहली जनवरी को ख के गोदाम में वस्तुएँ परिदत्त करेगा। उस दिन ख के गोदाम में किन्तु उसके बन्द होने के प्रायिक समय के पश्चात् क वस्तुओं को लाता है और वे नहीं ली जाती हैं । क ने अपनी प्रतिज्ञा का पालन नहीं किया है।30

(3) निश्चित दिन पर पालन के लिए आवेदन का उचित समय और स्थान-धारा 48 के अनुसार, जब किसी प्रतिज्ञा का पालन निश्चित दिन किया जाता है और प्रतिज्ञाग्रहीता द्वारा आवेदन किये जाने के बिना उसका पालन करने का प्रतिज्ञाकर्ता ने वचन नहीं दिया है तब उचित स्थान पर और कारबार के प्रायिक समय के भीतर पालन के लिए आवेदन करना प्रतिज्ञाग्रहीता का कर्तव्य है। धारा 48 की व्याख्या में यह भी स्पष्ट किया गया है कि यह प्रश्न कि “उचित समय और स्थान कौन-सा है” प्रत्येक अवस्था-विशेष में तथ्य का प्रश्न है।

(4) जहाँ पालन के लिए आवेदन न किया जाना हो और कोई स्थान नियत न हो, वहाँ प्रतिज्ञा के पालन के लिए स्थान-जब कि किसी प्रतिज्ञा का पालन प्रतिज्ञाग्रहीता द्वारा आवेदन के किये जाने के बिना किया जाना है और उसके पालन के लिए कोई स्थान नियत नहीं है तब प्रतिज्ञाकर्ता का कर्त्तव्य है कि वह प्रतिज्ञा के पालन को युक्तियुक्त स्थान नियुक्त करने के लिए प्रतिज्ञाग्रहीता से आवेदन करे और ऐसे स्थान में उसका पालन करे।31 उदाहरण के लिए, क नियत दिन ख को एक हजार मन पटसन परिदत्त करने का वचन देता है। क को ख से आवेदन करना चाहिए कि वह उसे लेने के प्रयोजन के लिए युक्तियुक्त स्थान नियत करे और ऐसे स्थान पर पटसन क द्वारा परिदत्त किया जाना चाहिए 132

(5) प्रतिज्ञाग्रहीता द्वारा विहित या मंजूर रीति में या समय में पालन-धारा 50 के अनुसार, किसी प्रतिज्ञा का पालन, किसी रीति में और किसी समय पर, जो कि प्रतिज्ञाग्रहीता विहित या मंजूर करता है, किया जा सकेगा। धारा 50 में वर्णित यह प्रावधान निम्नलिखित दृष्टान्तों से और भी स्पष्ट हो जाता है

(क) ख, क को 2,000 रुपये का देनदार है। क वांछा करता है कि ख उस रकम को साहूकार ग के यहाँ क के लेखे में जमा करा दे। ख जिसकी ग के यहाँ साहूकारी चलती है, यह आदेश देता है कि वह रकम उसके लेख में से अन्तरित करके क के नाम जमा कर ली जाय और ग ऐसा कर देता है। तत्पश्चात् और उससे पूर्व कि क को अन्तरण का ज्ञान हो, ग दिवालिया हो जाता है। ख की देनगी प्रभावी देनगी है।

(ख) क और ख परस्पर ऋणी हैं । क और ख एक मद को दूसरे के विरुद्ध प्रतिपादित करके लेखा तय करते हैं और ऐसे तय किये जाने पर, उसके शोध्य अतिशेष धन ख, क को देता है। यह क और ख द्वारा क्रमश: एक-दूसरे को उन राशियों की, की गयी देनगी है जिनके कि वह एक-दूसरे के प्रति देनदार थे।

(ग) क, ख को 2,000 रुपये का देनदार है। ख, क की कुछ वस्तुओं को उस ऋण में कमी करने के लिए प्रतिग्रहीत करता है। वस्तुओं के परिदान से अंशतः देनगी हो जाती है।

(घ) क यह वांछा करता है कि ख, जो उसे 100 रुपये का देनदार है, उसे डाक द्वारा 100 रुपये का नोट भेज। जैसे ही ख, नोट अन्तर्विष्ट करने वाले पत्र को, जिस पर क का पता सम्यक्रूपेण लिखा है, डाक में डालता है, वैसे ही ऋण का उन्मोचन हो जाता है।

30. धारा 47 का दृष्टान्त।

31. धारा 49.

32. धारा 49 का दृष्टान्त।

जिस संविदा में समय सारभूत है, उसका नियत समय पर पालन करने में असफलता का प्रभाव –भारतीय संविदा अधिनियम की धारा 55 के अनुसार-

“जब कि किसी संविदा में का एक पक्षकार किसी बात को उल्लिखित समय पर या से पूर्व या किन्हीं बातों को उल्लिखित समयों पर या से पूर्व करने की प्रतिज्ञा करता है और किसी ऐसी बात को उस उल्लिखित समय पर या पूर्व करने में असफल रहता है तो वह संविदा या उसमें से इतनी जितनी का पालन नहीं किया गया है, यदि पक्षकारों का आशय यह था कि समय संविदा का सार होना चाहिये, प्रतिग्रहीता के विकल्प पर शून्यकरणीय हो जाती है।”

उपर्युक्त उपबन्ध से यह स्पष्ट होता है कि किसी वाद विशेष में समय संविदा का सार था अथवा नहीं, यह बात पक्षकारों के आशय पर निर्भर करती है। इस सम्बन्ध में भद्र चन्द्र बनाम बेट्स (Bhadra Chand v. Betts)33 एक प्रमुख वाद है। इस वाद के तथ्य निम्नलिखित हैं-

इस वाद में वादी ने प्रतिवादी को जंगली हाथियों को पकड़ने हेतु एक हाथी अक्टूबर 1, 1910 को परिदत्त करने का उत्तरदायित्व लिया था। बाद में, वादी की प्रार्थना पर प्रतिवादी ने उसे 6 अक्टूबर तक हाथी परिदत्त करने की अनुमति प्रदान कर दी। परन्तु वह 6 अक्टूबर तक भी हाथी परिदत्त करने में असफल रहा तथा अन्त में उसने हाथी परिदत्त करने की पेशकश 11 अक्टूबर, 1910 को की। परन्तु अब प्रतिवादी ने उसे लेने से इन्कार कर दिया। न्यायालय ने धारित किया कि इस वाद में समय संविदा का सार था, अत: वादी उसे 11 अक्टूबर को लेने से इन्कार करने का अधिकारी था।

किसी संविदा में समय सार है अथवा नहीं, यह वाद के तथ्य एवं परिस्थितियों तथा संविदा अधिनियम की धारा 55 पर निर्भर करता है।34 उदाहरण के लिये जहाँ पक्षकारों ने करार को उन अर्थों में कभी नहीं समझा (अर्थात् इन अर्थों में नहीं समझा कि समन संविदा का सार है) तथा समय की समाप्ति के बाद भी भुगतान की माँग की, न्यायालय ने धारित किया कि समय संविदा का सार नहीं था।35 पक्षकारों के आशय का पता रिकार्ड में सामान से लगाया जाता है। किसी संविदा में समय सार है या नहीं यह तथ्य का प्रश्न है तथा इसका निर्णय वाद के रिकार्ड में तथ्यों पर निर्भर करता है। वास्तविक परीक्षण पक्षकारों का आशय है। सामान्य सिद्धान्त यह है कि अचल सम्पत्ति के मामले में समय सार नहीं होता है। परन्तु इस नियम के अपवाद वाद के तथ्यों के आधार पर हो सकते हैं। पक्षकार तथ्यों के आधार पर अचल सम्पत्ति के मामले में भी समय को सार बना सकते हैं।36

यदि भूमि के विक्रय के सम्बन्ध में लिखित करार में एक उपधारा उल्लिखित कर दी जाय कि चूक पर हर्जाना पड़ेगा, तो यह इस बात का साक्ष्य नहीं है कि समय संविदा का सार था (“Mere incol in the written agreement of a clause imposing penalty in case of default does not by itself evidence an intention to make time the essence of the contract.”)37

अतः संविदा में केवल यह उल्लेख कि संविदा उल्लिखित दिन को पूर्ण होती है या चक होने पर हर्जाने के सम्बन्ध में उल्लेख, स्वयं में पक्षकारों के आशय का साक्ष्य नहीं होते हैं तथा समय की संविदा का सार नहीं बनाते हैं। यह निर्णय राजस्थान उच्च न्यायालय ने हाल के ही एक वाद पाखर सिंह बनाम किशन सिंह (Pakhar Singh v. Kishan Singh)38 में दिया। अपने निर्णय में न्यायालय ने कहा कि पक्षकारों के आशय का निम्नलिखित बातों से पता लगता है-

(1) करार की भाषा, जिसमें स्पष्ट निर्बन्धन होना चाहिये कि पक्षकार अपने अधिकारों को समय की सीमा (Time-limit) के पालन पर निर्भर करना चाहते हैं।

* सी० एस० ई० (1989) प्रश्न 5 (स) के लिये भी देखें। .

33. (1915) 22 कलकत्ता एल० जे० 566.

34. बैलक्यानाथ मैटी बनाम प्रोवाबती सनत्रा, ए० आई० आर० 1974 कलकत्ता 261, 264.

35 अमतेश्वर आनन्द बनाम वीरेन्द्र मोहन सिंह, ए० आई० आर० 2006 एस० सी० 151, 160-161.

36. मेसर्स नानक बिल्डर्स ऐण्ड इनवेस्टर्स प्राइवेट लि. बनाम विनोद कुमार अलग, ए० आई० आर० 1991 दिल्ली 315, पृष्ठ 321-322.

37. मंगलराम नामसूद्रा बनाम परमानन्द नामसूद्रा, ए० आई० आर० 1972 ए. ऐण्ड एन०8.10.

38. ए० आई० आर० 1974 राजस्थान 112.

(2) विक्रय होने वाली सम्पदा का स्वरूप (nautre) तथा

(3) संविदा के समय या पूर्व पक्षकारों का आचरण तथा परिस्थितियाँ।

न्यायालय ने अपने निर्णय में यह भी कहा कि अचल सम्पदा के विक्रय के मामले में सामान्य उपधारणा (presumption) यह होती है कि समय संविदा का सार नहीं था।39 इस नियम का अनुमोदन उच्चतम न्यायालय ने श्रीमती इन्दिरा कौर तथा अन्य बनाम शिव लाल कपूर (Smt. Indira Kaur v. Sheo Lal Kapoor)40 के वाद में भी किया है।

“The law is well-settled that in transactions of sale of immovable properties, time is not the essence of the contract.”41

इस नियम का अनुमोदन उच्चतम न्यायालय ने श्रीमती चाँद रानी (मृतक) विधिक प्रतिनिधियों द्वारा बनाम श्रीमती कमल रानी (मृतक) विधिक प्रतिनिधियों द्वारा (Smt. Chand Rani (dead) by L. Rs. V. Kamal Rani (dead) by L.Rs)42 के वाद में भी किया है। उच्चतम न्यायालय की पाँच न्यायमूर्तियों की पीठ की ओर से निर्णय देते हुये न्यायमूर्ति एस० मोहन ने अपने निर्णय में यह भी कहा कि यदि समय संविदा का सार नहीं भी है तो भी न्यायालय यह निष्कर्ष निकाल सकता है कि संविदा का पालन युक्तियुक्त समय के अन्दर किया जाना है अगर निम्नलिखित शर्ते हैं

(1) संविदा के व्यक्त निबन्धनों से;

(2) सम्पदा की प्रकृति से; तथा

(3) परिवर्ती (Surrounding) परिस्थितियों से, उदाहरण के लिये-संविदा करने का उद्देश्य।

प्रस्तुत वाद में, मकान के विक्रय करने के दिनांक 26 अगस्त, 1971 के करार के अनुसार, प्रथम पक्षकार ने अग्रिम धन के रूप में 30,000 रुपये प्राप्त किये तथा 98,000 रुपये 10 दिन के अन्दर द्वितीय पक्षकार द्वारा दिये जाने थे तथा शेष 50,000 रुपये विक्रय के पंजीकरण के समय दिये जाने थे। उच्चतम न्यायालय ने निर्णय दिया कि यद्यपि सामान्य नियम के अनुसार समय संविदा का सार नहीं है परन्तु पक्षकारों का आशय समय को सार बनाने का था।43 चूँकि क्रेता उक्त धन देने को तैयार तथा इच्छुक नहीं था, वह संविदा के विनिर्दिष्ट पालन का अधिकारी नहीं था 44

यह भलीभाँति स्थापित नियम है कि जब तक कि विपरीत आशय स्पष्ट न हो, भूमि सम्पत्ति की संविदा में समय संविदा का सार नहीं होता है तथा इस बात से अन्तर नहीं पड़ता है कि करार लिखित है तथा उसमें संविदा के पूरे होने की अवधि उल्लिखित है।45 अतः यह निष्कर्ष कि समय संविदा का सार है या नहीं, करार के निबन्धन तथा परिस्थितियों से निकाला जाना चाहिये।46 किसी संविदा में समय को संविदा का सार मानने का आशय वाद की परिस्थितियों से निकाला जा सकता है। परन्तु भूमि के विक्रय की संविदा में परिस्थितियाँ यथेष्ट बलवान होने पर ही इस साधारण परिकल्पना का विखण्डन किया जा सकता है कि भूमि के विक्रय की संविदा में समय संविदा का सार नहीं होता है।47 यदि किसी वाद में वादी तर्क करता है कि संविदा में समय सार नहीं है तथा प्रतिवादी इससे इन्कार नहीं करता है तो न्यायालय वादी के तर्क को स्वीकार करने को बाध्य है।48

39. देखें : ए० आई० आर० 1967 एस० सी० 868; गोविन्द प्रसाद चतुर्वेदी बनाम हरीदत्त शास्त्री, ए० आई० आर० 1977 एस० सी० 1005.

40. ए० आई० आर० 1988 एस० सी० 1074, पृष्ठ 1078-1079.

41. गोविन्द प्रसाद चतुर्वेदी बनाम हरी दत्त शास्त्री, ए० आई० आर० 1977 एस० सी० 1005 को भी देखें।

42. ए० आई० आर० 1993 एस० सी० 1742, 1748.

43. तत्रैव, पृष्ठ 1749; वैरावन बनाम के० एस० विद्यानन्दनम, ए० आई० आर० 1996 मद्रास 353, 358-359

44. तत्रैव, पृष्ठ 1750.

45. जमशेद बनाम बरजोर जी, 43 इण्डियन अपील्स, 26 : ए० आई० आर० 1915 पी० सी० 83.

46. गोविन्द लाल चावला बनाम सी० के० शर्मा, ए० आई० आर० 1978 इलाहाबाद 446, 449.

47. गोविन्द प्रसाद चतुर्वेदी बनाम हरीदत्त शास्त्री, ए० आई० आर० 1977 एस० सी० 1005.

48. ए० आई० आर० 1982 कर्नाटक 93, 97.

यदि पक्षकारों का यह आशय नहीं था कि “समय संविदा का सार हो तो संविदा, ऐसी बात उल्लिखित समय पर या से पूर्व करने में असफल रहने से, शून्यकरणीय नहीं हो जाती है। किन्तु प्रतिज्ञाग्रहीता ऐसी असफलता से उसे हुई किसी हानि के लिए प्रतिज्ञाकर्ता से प्रतिकर पाने का हकदार है।”49

धारा 55 के सम्बन्ध में दो भलीभाँति स्थापित नियम निम्नलिखित हैं

(1) यदि मौलिक संविदा में समय संविदा का सार नहीं था, तो बाद में संविदा के एक विशिष्ट दिन पालन की सूचना देकर समय को सार बनाया जा सकता है। परन्तु दिया गया उक्त समय युक्तियुक्त होना चाहिये।

(2) यदि समय संविदा का सार है तो पक्षकारों के आचरण द्वारा इसका अभित्याग किया जा सकता है।50

इसके अतिरिक्त, यदि ऐसी संविदा की अवस्था में जो कि करार पाये गये समय में प्रतिज्ञा के पालन में प्रतिज्ञाकर्ता की असफलता के कारण शून्यकरणीय है, प्रतिज्ञाग्रहीता ऐसी प्रतिज्ञा का पालन करार पाये गये से भिन्न किसी समय पर प्रतिग्रहीत करता है, तो प्रतिज्ञाग्रहीता पाये गये समय पर प्रतिज्ञा के अनुपालन से हुई किसी हानि के लिए जब तक कि उसने ऐसे प्रतिग्रहण के समय ऐसा करने के आशय की सूचना प्रतिज्ञाकर्ता को नहीं दे दी हो, प्रतिकर का दावा नहीं कर सकता 51

यदि सरकार से की गयी संविदा में, जिसमें कि किसी निश्चित दिन वस्तुयें परिदत्त की जानी हैं, संविदा की शर्तों में ही यह उपबन्ध है कि समय का विस्तार किया जा सकता है, तो ऐसी संविदा का समय सारभूत नहीं होगा। यह निर्णय कलकत्ता उच्च न्यायालय ने हाल के वाद, आनन्द कान्सट्रक्शन वर्क्स बनाम बिहार राज्य (Anand Construction Works v. The State of Bihar)52 में दिया। न्यायालय ने यह भी कहा कि ऐसी दशा में धारा 55 का दूसरा पैराग्राफ लागू होगा तथा उल्लिखित दिन वस्तुयें प्रदान करने की असफलता से संविदा शून्यकरणीय नहीं होगी। बिना संविदा को समाप्त किये हुए सरकार, संविदा की शर्तों के अनुसार मुआवजे का दावा कर सकती है तथा संविदा के अनुपालन की अनुमति दे सकती है। ऐसे मामले में धारा 55 का तीसरा पैराग्राफ लागू नहीं होगा, क्योंकि समय संविदा का सार नहीं है।53

धारा 55 प्रतिज्ञाग्रहीता (Promisee) को इस बात की अनुमति नहीं देती है कि वह संविदा को इस आशा से जीवित रखे कि वाद में उसे अधिक मुआवजा मिलेगा। धारा 55 तथा प्रत्याहरण से सम्बन्धित धारा 2 (1) से तात्पर्य यह है कि प्रतिज्ञाकर्ता संविदा को लागू कराने की शक्ति खो देता है, अर्थात् वह संविदा के अन्तर्गत किसी लाभ को प्राप्त नहीं कर सकता है। यह प्रतिज्ञाग्रहीता की स्वेच्छा के ऊपर है कि वह लाग करवाये अथवा नहीं, परन्तु संविदा के उल्लंघन के लिए वह कोई ऐसी नुकसानी (damages) प्राप्त नहीं कर सकता जो कि उल्लंघन के बाद उनके अपने कार्य से प्रतिविरत रहने के कारण हो।54

यहाँ पर यह उल्लेखनीय है कि यदि किसी संविदा में व्यक्त रूप से यह प्रावधान है कि समय संविदा का सार है परन्त कछ विशेष प्रावधानों के अनुसार समय पर कार्य न समाप्त होने पर बढाये हए समय पर प्रत्येक दिन या सप्ताह के लिए दण्ड देना होगा तो संविदा में व्यक्त प्रावधान के बावजूद समय संविदा का सार नहीं माना जायगा। यह नियम उच्चतम न्यायालय ने हिन्द कान्ट्रक्शन कान्ट्रैक्टर्स बनाम स्टेट ऑफ महाराष्ट्र (Hind Construction Contractors v. State of Maharashtra)55 के वाद में प्रतिपादित किया था।

49. धारा 55 का पैरा 2.

50. दीपनारायण सिन्हा बनाम दीनानाथ सिंह, ए० आई० आर० 1981 पटना 69, 73.

51. धारा 55 का पैरा 3.

52. ए० आई० आर० 1973 कलकत्ता 550.

53. तत्रैव, पृ० 555.

54. एन० सन्दरेश्वन बनाम मेसर्स श्रीकृष्ण रिफाईनरीज, ए० आई० आर० 1977 मद्रास 109, 115.

55. ए० आई० आर० 1979 एस० सी० 720.

इसी प्रकार का निर्णय उच्चतम न्यायालय ने एच० एस० आई० डी० सी० बनाम हरीओम दण्टरप्राइजेज (HSIDC v. Hari Om Enterprizes)56 के वाद में दिया। इस वाद में उच्चतम न्यायालय ने धारित किया कि जहां किसी संविदा समय के विषय में नम्यता या लचीलापन है तो समय में संविदा का पालन आदेशक (Imperative) नहीं होता है। दूसरे शब्दों में ऐसे मामलों में समय संविदा का सार नहीं होता

सम्पत्ति के प्रतिहस्तांतरण की संविदाओं में समय संविदा का सदैव सार होता है। जहाँ किसी संविदा में नवीनीकरण तथा पुन:विक्रय दोनों के ही विकल्प खुले हैं, विधि की दृष्टि से समय संविदा का सार हो जाता है; अतः प्रतिहस्तांतरण संविदा (reconveyance) में जहाँ निर्दिष्ट समय के भीतर धन नहीं दिया गया, वादी का पुनः विक्रय का विकल्प समाप्त माना जायगा। यह नियम उच्चतम न्यायालय ने श्रीमती बिस्मल्लाह बेगम (मृतक), विधिक प्रतिनिधियों द्वारा बनाम रहमतउल्लाह खान (मृतक) विधिक ufafferet art (Smt. Bismisllah Begum (dead) by L.RS v. Rahmatullah (dead) by L.Rs)57 के वाद में प्रतिपादित किया। इस वाद में अपीलार्थी मृतक वादी के विधिक प्रतिनिधि है। मृतक वादी का एक मकान कानपुर में था उन्होंने 2000 रुपये में मकान के विक्रय के लिये प्रतिवादी के साथ एक संविदा की तथा उसी दिन प्रतिवादी के साथ मकान के प्रतिहस्तांतरण के लिये एक करार किया। प्रतिहस्तांतरण के करार के अनुसार यदि तीन वर्षों के अन्दर विक्रेता उक्त विक्रय धन तथा कुछ अन्य खर्चे या धन जो इस बीच क्रेता मकान पर लगाता है, वापस कर देता है तो वह सम्पत्ति वापस पाने का अधिकारी होगा।

प्रस्तुत वाद उक्त प्रतिहस्तांतरण की संविदा के विनिर्दिष्ट पालन के लिये की गई थी। निचले न्यायालय ने वाद खारिज कर दिया तथा यह भी धारित किया कि वादी की ओर से विक्रय प्रतिफल वापस करने का कोई प्रयास नहीं किया गया। उच्चतम न्यायालय ने भी अपील खारिज कर दी तथा उपर्युक्त वर्णित नियम प्रतिपादित किया।

जैसा कि ऊपर उल्लेख किया जा चुका है अचल सम्पत्ति के मामले में जब तक कि बिपरीत आशय व्यक्त न हो, परिकल्पना यह होती है कि समय संविदा का सार नहीं है। किसी संविदा में करार करने के पूर्व अपीलार्थी इस बात से भिज्ञ थे कि समय संविदा का सार है। बार-बार यह उल्लेख किया गया था कि समय संविदा का सार है तथा अपीलार्थी को अवश्य बाकी धन जमा करना होगा तथा यह धन संविदा में उल्लिखित निश्चित समय पर करना होगा। अत: न्यायालय ने यह धारित किया कि वर्तमान संविदा में समय संविदा का सार था।58

जैसा कि ऊपर उल्लेख किया गया है कि अचल सम्पत्ति के बारे में परिकल्पना (presumption) होती है कि समय संविदा का सार है। उच्चतम न्यायालय ने राजकिशोर (मृतक) विधिक प्रतिनिधि द्वारा बनाम प्रेम सिंह (Rajkishore (Dead) By LRs v. Prem Singh and others)59 के वाद में धारित किया है कि अचल सम्पत्ति के प्रतिहस्तान्तरण (reconveyance) के मामले में समय संविदा का सदैव सार होता है।60 उच्चतम न्यायालय के शब्दों में :

“More importantly, in a case where the parties have entered into a transaction of sale and also executed an agreement for reconveyance of the property sold, time stipulated is the essence of the contract.”

56. (2009) 16 एस० सी० सी० 208 : ए० आई० आर० 2009 एस० सी० 218; मनु कौर बनाम हरतार सिंह संघा, (2010) 10 एस० सी० सी० 512.

57. ए० आई० आर० 1998 एस० सी० 970, 972; न्यायालय ने ए० आई० आर० 1928 पी० सी० 208, ए० आर० 1969 एस० सी० 405; कैलटेक्स लि. बनाम भगवाद देवी मारोडिया के वादों में प्रतिपादित नियम का अनुसरण किया।

58. ए० के० लक्ष्मीपथी बनाम राय साहेब पन्नालाल एस० लाहोटी चैरिटेबल ट्रस्ट, (2010)1 ए० सी० सी० 287.

59. (2011)1 एस० सी० सी० 313 : (2011)1 एस० सी० सी० 657.

60. तत्रैव, पृष्ठ 321.

उच्चतम न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि यह नियम उच्चतम न्यायालय के पूर्व वादों, छुन्नन झा बनाम इबादत अली61; बिस्मिल्लाह बेगम बनाम रहमत उल्लाह खान62 तथा गौरीशंकर प्रसाद बनाम ब्रह्मानन्द सिंह63 में तय हो चुका है।

आर० के सक्सेना बनाम डेलही डवलपमेन्ट अथार्टी (R. K. Saxena v. Delhi Development Authority)64 के वाद में दिल्ली विकास प्राधिकरण ने भू-भागों के आवंटन के लिये भू-भागों की नीलामी-विक्रय किया। भुगतान के लिये एक निश्चित समय निर्धारित किया गया। नीलामी में क्रेता को भुगतान के लिये कुछ समय का विस्तार किया गया बशर्ते वह ब्याज भी दे। क्रेता फिर भी भुगतान नहीं कर पाया। समय बीतने के बाद क्रेता द्वारा ब्याज सहित धन जमा किया गया तथा विकास प्राधिकरण ने उसे स्वीकार कर लिया। उच्चतम न्यायालय ने निर्णय दिया कि यह माना जायगा कि भुगतान के लिये समय का विस्तार किया गया था। अत: धन स्वीकार करने के पश्चात आवंटन रद्द करना अनुचित है 65

व्यतिकारी प्रतिज्ञाओं का पालन (Performance of Reciprocal promises)—व्यतिकारी का अर्थ “बदले में” या “पारस्परिक” होते हैं। व्यतिकारी प्रतिज्ञाओं की संविदा एक ऐसी संविदा होती है जिसमें प्रतिज्ञाओं का आदान-प्रदान होता है। धारा 51 से 54 तक व्यतिकारी प्रतिज्ञाओं से सम्बन्धित हैं।

जब तक कि पारस्परिक प्रतिज्ञाग्रहीता पालन के लिए तैयार और रजामन्द न हों तब तक पालन के लिए प्रतिज्ञाकर्ता का बाध्य न होना-धारा 51 के अनुसार-

“जब कोई संविदा साथ-साथ पालन की जाने वाली पारस्परिक प्रतिज्ञाओं से गठित है तब किसी प्रतिज्ञाकर्ता के लिए, जब तक कि प्रतिज्ञाग्रहीता अपनी पारस्परिक प्रतिज्ञा का पालन करने के लिए तैयार और रजामन्द नहीं है, अपनी प्रतिज्ञा का पालन करना आवश्यक नहीं है।”

धारा 51 के निम्नलिखित दृष्टान्त भी उल्लेखनीय हैं

दृष्टान्त-(क) क और ख संविदा करते हैं कि क, ख को वस्तुयें परिदत्त करेगा जिनके लिए कि देनगी वस्तुओं के परिदान पर की जायगी। जब तक ख वस्तुओं के परिदान पर उनके लिए देनगी करने के लिए तैयार और रजामन्द नहीं हो, क के लिए वस्तुओं का परिदान करना आवश्यक नहीं है।

जब तक कि क देनगी लिए जाने पर वस्तुओं को परिदत्त करने के लिए तैयार और रजामन्द नहीं है, ख के लिए देनगी करना आवश्यक नहीं है।

(ख) क और ख संविदा करते हैं कि क कीमत विशेष पर ख को वस्तुओं का परिदान करेगा और कीमत किश्तों में दी जायगी और पहली किश्त परिदान पर दी जानी है।

जब तक कि ख परिदान पर पहली किश्त देने के लिए तैयार और रजामन्द नहीं है, क के लिए वस्तुओं का परिदान करना आवश्यक नहीं है

जब तक कि क पहली किश्त की देनगी पर वस्तुयें परिदत्त करने के लिए तैयार और रजामन्द नहीं है, ख के लिए पहली किश्त देना आवश्यक नहीं है।

धारा 51 में वर्णित नियम कॉमन विधि (Common Law) के नियम के समान है कि पारस्परिक प्रतिज्ञाओं की संविदा में, प्रत्येक ओर से प्रतिज्ञा एक-दूसरे के लिए प्रतिफल है।66

व्यतिकारी वचनों के करार के मामले में उच्चतम न्यायालय ने भी इसी सिद्धान्त की पुष्टि मोहम्मद बनाम पुष्पलता (Mohammed v. Pushpalatha),67 में की है। इस वाद में किराये पर उठी सम्पत्ति के

61. ए० आई० आर० 1954 एस० सी० 345.

62. (1998) 2 ए० सी०सी० 226.

63 (2008) 8 एस० सी० सी० 287; आदेशिर मामा बनाम फलोरा सासन, (1927-28) 55 आई० ए० 360: ए० आई०

आर० 1928 पी० सी० 208 को अवश्य देखें.

64. ए० आई० आर० 2002 एस० सी० 2340.

65. तत्रैव 2341.

66. पोलक ऐण्ड मुल्ला, इण्डियन कान्ट्रैक्ट एक्ट ऐण्ड स्फेसिफिक रिलीफ ऐक्ट, नवाँ संस्करण, १० 379.

67. ए० आई० आर० 2009 एस० सी० 479.

बारे में एक करार हुआ कि उक्त सम्पत्ति का पुनर्निर्माण कराया जाय जिसमें प्रसाधन (toilet) सुविधा समेत किया जाय। किरायेदार पुनःनिर्माण होने पर अधिक किराया देने का वचन देता है। उक्त सम्पत्ति का पुन: निर्माण करा दिया जाता है परन्तु पुनःनिर्माण प्रसाधन सुविधा के बिना किया जाता है। किरायेदार को उक्त सम्पत्ति का कब्जा दे दिया जाता है। उच्चतम न्यायालय ने धारित किया कि किरायेदार अधिक किराया देने के लिये आबद्ध नहीं है। चूँकि प्रसाधन सुविधा का निर्माण नहीं किया गया है किरायेदार अधिक किराया देने के लिये आबद्ध नहीं है।68

व्यतिकारी प्रतिज्ञाओं के पालन का क्रम (Order of Performance of Reciprocal Promises)—व्यतिकारी प्रतिज्ञाओं के पालन के क्रम के सम्बन्ध में धारा 62 में सामान्य नियम यह प्रतिपादित किया गया है जब कि वह क्रम जिसमें कि पारस्परिक प्रतिज्ञाओं का पालन किया जाना है, संविदा द्वारा अभिव्यक्तरूपेण नियत है तब उनका पालन इस क्रम में किया जायेगा; और जहाँ कि क्रम संविदा द्वारा अभिव्यक्तरूपेण नियत नहीं है, वहाँ उनका पालन इस क्रम में किया जायेगा जो कि उस संव्यवहार के स्वरूप से अपेक्षित है। उदाहरण के लिए, क और ख संविदा करते हैं कि क नियत कीमत पर ख के लिए एक गृह बनायेगा। गृह बनाने की क की प्रतिज्ञा का पालन ख की उसके लिए देनगी करने की प्रतिज्ञा के पालन से पहले किया जाना चाहिये।69 इसी प्रकार, यदि क और ख संविदा करते हैं कि क अपना व्यापार स्टाक नियत कीमत पर ख को दे देगा और ख धन की देनगी करने के लिए प्रतिभूति देने की प्रतिज्ञा करता है। क की प्रतिज्ञा का पालन किया जाना तब तक आवश्यक नहीं है जब तक कि प्रतिभूति नहीं दे दी जाती क्योंकि इस संव्यवहार के स्वरूप से अपेक्षित है कि अपने व्यापार-स्टाक करने से पूर्व क को प्रतिभूति मिलनी चाहिये।70

जिस घटना के होने पर संविदा प्रभावशाली होनी है उसका निवारण करने वाले पक्षकार का दायित्व-जब कि किसी संविदा में व्यतिकारी प्रतिज्ञाएं अन्तर्विष्ट हैं और संविदा में एक पक्षकार दूसरे को उसकी प्रतिज्ञा के पालन से निवारित रखता है तब संविदा इस प्रकार निवारित किये गये पक्षकार के विकल्प पर शून्यकरणीय हो जाती है और वह किसी हानि के लिए, जो कि संविदा के अनुपालन के परिणामस्वरूप उसे उठानी पड़ती है, दूसरे पक्षकार से प्रतिकर पाने का हकदार है।71 उदाहरण के लिए, क

और ख संविदा करते हैं कि ख एक हजार रुपये के लिए क के लिए कार्य-विशेष निष्पादित करेगा। ख उस कार्य को तदनुसार निष्पादन करने के लिए तैयार और राजी है, परन्तु क उसे वैसा करने से रोकता है। संविदा ख के विकल्प पर शून्यकरणीय है, और यदि वह उसे विखण्डित करने का परिवरण करता है तो वह किसी हानि के लिए जो कि वह उसने उसके अपालन से उठाई है, क में प्रत्युद्धरित करने का हकदार है।72

पारस्परिक प्रतिज्ञाओं से गठित संविदा में उस प्रतिज्ञा को पूरा करने के बारे में, जिसका पहले पालन किया जाना चाहिये, चूक का प्रभाव-धारा 54 के अनुसार, जब कि कोई संविदा ऐसे पारस्परिक प्रतिज्ञाओं से गठित है कि उनमें से एक का पालन या उसके पालन का दावा तब तक नहीं किया जा सकता जब तक कि दूसरी का पालन नहीं कर दिया जाता है और अन्तिम वर्णित प्रतिज्ञा का प्रतिज्ञाकर्ता उसका पालन करने में असफल रहता है, तब ऐसा प्रतिज्ञाकर्ता पारस्परिक प्रतिज्ञा के पालन का दावा नहीं कर सकता और उसे संविदा में के उस दूसरे पक्षकार की किसी हानि के लिए जो कि ऐसा अन्य पक्षकार संविदा के अपालन से उठाये, प्रतिकर देना पड़ेगा।

दृष्टान्त-(1) क, ख के पोत को, क द्वारा दिये जाने वाले नौपण्य को भरने और कलकत्ते से भाराशस तक प्रवहण करने के लिए अवक्रय पर लेता है और ख को उसके प्रवहण के लिए वस्तु भाड़ा विशष मिलना है। क पोत के लिए नौपण्य (cargo) नहीं देता। क, ख की प्रतिज्ञा का पालन किये जाने के

68. ए० आई० आर० 2009 एस० सी० 480.

69. धारा 52 का दृष्टान्त (क)।

70. धारा 52 का दृष्टान्त (ख)।

71. धारा 53.

72. धारा 53 का दृष्टान्त।

लिए दावा नहीं कर सकता और उसे ख की उस हानि के लिए जो कि ख संविदा के अपालन से उठाता है, प्रतिकर देना पड़ेगा।73

(2) क एक नियत कीमत पर कोई निर्माण कार्य निश्पादित करने के लिए ख से संविदा करता है। ख उस कार्य के लिए आवश्यक पाड़ और इमारती लकड़ी देने वाला है। ख कोई पाड़ या लकड़ी देने से इन्कार करता है और कार्य निष्पादित नहीं किया जा सकता। क के लिए कार्य का निष्पादन करना आवश्यक नहीं है और ख, क को उस हानि के लिए जो कि संविदा के अपालन से उठाता है, प्रतिकर देने के लिए बाध्य है।74

जहाँ राज्य ने किसी व्यक्ति को एक औद्योगिक भूमिखण्ड आबंटित किया है, भूमिखण्ड पर इमारत बनाने तथा औद्योगिक उत्पाद आरम्भ करने का समय आबंटन के पत्र में निश्चित किया गया है। निगम द्वारा आबंटिती को भूमिखंड का कब्जा देने तथा योजना की अनुमति देने में विलम्ब किया गया। भूमिखण्ड के पुनर्ग्रहण की कार्यवाही मनमानी (arbitrary) होगी। यह निर्णय उच्चतम न्यायालय ने एम० डी०, एच० एस० आई० डी० सी० बनाम मेसर्स हरी ओम इन्टरप्राइजेज (M.D., H.S.I.D.C. V. M/s. Hariom Enterprises),75 के वाद में दिया था। इस वाद में न केवल विनिर्दिष्ट धन किश्तों में दिया जाना था वरन् उक्त धन 18 प्रतिशत ब्याज के साथ दिया जाना था। उच्चतम न्यायालय ने निर्णय में कहा कि यदि कोई चूक हुई है तो न केवल एक अवसर दिया जाना चाहिये था तथापि पुनर्ग्रहण तभी होना चाहिये था जब दिये गये अवसर का उल्लंघन किया गया होता।

वैध बातों और अन्य अवैध बातों को भी करने की पारस्परिक प्रतिज्ञा-धारा 57 के अनुसार, जब कि व्यक्ति, प्रथमतः, कुछ बातें करने की, जो कि वैध हैं और द्वितीयतः उल्लिखित परिस्थितियों के अधीन कुछ अन्य बातें करने की, जो कि अवैध हैं, पारस्परिक रूप से प्रतिज्ञा करते हैं तो प्रतिज्ञाओं का प्रथम संवर्ग संविदा है; किन्तु द्वितीय संवर्ग शून्य करार है। उदाहरण के लिए क और ख करार करते हैं कि क, ख को एक गृह 10,000 रुपये के लिए बेचेगा; किन्तु यदि ख उसे एक जुआघर के रूप में उपयोग में लाये तो वह क को उसके लिए 50,000 रुपये देगा। पारस्परिक प्रतिज्ञाओं का, अर्थात् गृह बेचने का और उसके लिए 10,000 रुपये देने का प्रथम संवर्ग संविदा है। द्वितीय संवर्ग विधि-विरुद्ध उद्देश्य के लिए है, अर्थात् इस उद्देश्य के लिए है कि ख उस गृह को जुआघर के रूप में उपभोग में लाये, शून्य करार है।76

तुरन्त अग्रिम संव्यवहार (ready forward transaction) के दो भाग होते हैं। तुरन्त भाग में नियत कीमत (stated price) पर प्रतिभूतियों (securities) का क्रय या विक्रय होता है जो प्रतिभूति प्रमाणपत्रों के तुरन्त परिदान पर प्रतिफल के भुगतान पर होता है। प्रतिभूति की सम्पत्ति के स्वामित्व का अन्तरण तुरन्त क्रेता के पक्ष में हो जाता है तथा उक्त प्रतिभूतियों के सम्बन्ध में विक्रेता के अधिकार समाप्त हो जाते हैं। तुरन्त अग्रिम संव्यवहार का दूसरा भाग अर्थात् अग्रिम भाग का अनुपालन भविष्य में नियत कीमत के भुगतान पर होता है। तुरन्त भाग का पूर्ण रूप से निष्पादन हो जाता है जबकि अग्रिम भाग का निष्पादन बाकी रहता है तथा भविष्य में होना शेष रहता है। अग्रिम भाग शून्य होता है तथा उसे लागू नहीं किया जा सकता। ऐसी दशा में संविदा अधिनियम की धारा 57 लागू होती है। यदि तुरन्त भाग का उद्देश्य या प्रतिफल अवैध नहीं है अथवा संविदा अधिनियम की धारा 23 द्वारा निषिद्ध नहीं है तो उसे लागू किया जा सकता है। इसके अतिरिक्त यदि अग्रिम भाग तुरन्त भाग का प्रतिफल या उद्देश्य नहीं है तो धारा 57 में वर्णित पृथक्करण का सिद्धान्त लागू होगा। अग्रिम भाग के शून्य तथा अवैध होने के कारण उसे लागू नहीं किया जा सकेगा परन्तु तरन्त भाग उससे प्रभावित नहीं होगा तथा उसे लागू कराया जा सकेगा।77

73. धारा 54 का दृष्टान्त (क)।

74. धारा 54 का दृष्टान्त (ख), दृष्टान्त (घ) तथा (ङ) भी देखें।

75. ए० आई० आर० 2009 एस० सी० 218, 223.

76. धारा 57 का दृष्टान्त।

77. ए० आई० आर० 1997 एस० सी० 1952, 1964, 1966, बी० ओ० आई० फाइनेन्स लि० बनाम द कस्टोडियन तथा अन्य।

ऐसी पर्यायतः प्रतिज्ञा होने की अवस्था में, जिसकी एक शाखा वैध है और दूसरी अवैध है, केवल वैध शाखा का ही प्रवर्तन कराया जा सकता है। 78 उदाहरण के लिए, क और ख करार करते हैं कि क, ख को 1,000 रुपये देगा जिसके लिए ख, क को तत्पश्चात् या तो चावल या चौरानीत (Smuggled) अफीम परिदत्त करेगा। यह चावल परिदत्त करने की मान्य संविदा और अफीम के बारे में शून्य करार है।79 देनगियों का विनियोग (Appropriation of Payments)

जहाँ कि वह ऋण उपदर्शित कर दिया गया है जिसका उन्मोचन किया जाना है, वहाँ देनगियों का उपयोजन-धारा 59 के अनुसार

“जहाँ कि कोई ऋणी, जिससे कि व्यक्ति को कई सुविशिष्ट ऋण शोध्य हैं, उस व्यक्ति को या तो इस अभिव्यक्त प्रज्ञापन के सहित, या ऐसी परिस्थितियों में जिनसे विवक्षित है कि वह देनगी किसी विशिष्ट ऋण के उन्मोचन के लिए उपयोजित की जानी है; कोई देनगी करता है, वहाँ, यदि वह देनगी प्रतिग्रहीत कर ली जाये तो, उसे तदनुसार उपयोजित करना पड़ेगा।”

धारा 59 को लागू होने के लिए निम्नलिखित तत्वों की उपस्थिति आवश्यक है-

(क) जहाँ ऋणी को किसी व्यक्ति को कई ऋण देने हैं।

(ख) उक्त ऋण को सुविशिष्ट (distinct) होना चाहिए।

(ग) ऋणी को अभिव्यक्त या विवक्षितरूपेण ऋणदाता को बताना चाहिये कि देनगी को किस विशिष्ट ऋणं के लिए उपयोजित किया जाये।

(घ) यदि उपर्युक्त वर्णित शर्तों की पूर्ति होती है, तो ऋणदाता देनगी को बताये गये ऋण के उन्मोचन के लिए उपयोजित किया जाय। धारा 59 में क्लेटन के विख्यात अंग्रेजी वाद (Clayton’s Case)80 में प्रतिपादित सामान्य नियम को अपनाया गया है।81

दृष्टान्त-धारा 59 में दिये गये निम्नलिखित दृष्टान्त उल्लेखनीय हैं

(क) अन्य ऋणों के साथ-साथ एक वचन-पत्र पर, जो पहली जून को शोध्य हो जाता है, क, ख को 1,000 रुपये का देनदार है। वह ख को उस रकम वाले किसी अन्य ऋण का देनदार नहीं है। पहली जून को क, ख को 1,000 रुपये देता है। यह देनगी वचन-पत्र का उन्मोचन करने के लिए उपयोजित की जानी है।

(ख) अन्य ऋणों के साथ-साथ क, ख को 567 रुपये का देनदार है। ख, क को लिखता है और इस राशि की देनगी करने की माँग करता है। क, ख को 567 रुपये भेजता है। यह देनगी उस ऋण के उन्मोचन के लिए उपयोजित की जानी है जिसकी देनगी करने की माँग ख ने की थी। विनियोग का साधारण नियम यह है कि यदि ऋणी भुगतान के उपयोजन के लिये कोई विशिष्ट निदेश नहीं देता है तो भुगतान का उपयोजन सर्वप्रथम ब्याज की अदायगी के लिये किया जायगा तथा शेष का उपयोजन मूल ऋण के भुगतान में किया जायगा। यह नियम उच्चतम न्यायालय ने मेघराज बनाम मुसम्मात बायाबाई (MeghrajvMst. Bayabai)82 के वाद में प्रतिपादित किया था।

मद्रास उच्च न्यायालय ने उपर्युक्त नियम को हाल में पंजाब नेशनल बैंक बनाम सुरीन्दर सिंह मन्डयाल (Punjab National Bank v. Surindar Singh Mandyal)83 में लागू किया है। ..

78. धारा 58.

79. धारा 58 का दृष्टान्त।

80. (1816)1 मर० 572.

81. क्लेटन के वाद (Clayton’s case) में यह निर्णय दिया गया था जब कोई ऋणदाता भुगतान करता है वह उसे जिस ऋण से चाह उपयोजित कर सकता है तथा लेनदार को उसी के अनुसार उपयोजित करेगा।

82. ए० आई० आर० 1970 एस० सी० 161.

83. ए० आई० आर० 1996 हिमाचल प्रदेश 1, 8.

परन्तु उच्चतम न्यायालय ने इस नियम को इन्ड्रस्ट्रियल क्रेडिट एण्ड डवलपमेन्ट सिन्डीकेट बनाम स्मिताबेन एस० पटेल (Industrial Development Syndicate v. Smithaben H. Patel)84 के वाद में परिवर्तित कर दिया। इस वाद में उच्चतम न्यायालय ने धारित किया कि किसी एक ऋण पर ब्याज को पृथक ऋण नहीं कहा जा सकता।

(2) जहाँ कि उन्मुक्ति किये जाने वाला ऋण उपदर्शित न किया गया हो, वहाँ देनगी का उपयोजन-जहाँ कि ऋणी ने यह प्रज्ञापित करने में कार्यलोप किया है और ऐसी अन्य परिस्थितियाँ नहीं हैं जिनसे कि यह उपदर्शित हो कि यह देनगी किस ऋण के उन्मोचन के लिए उपयोजित की जानी है, वहाँ ऋणदाता उसे ऐसे किसी विधिपूर्ण ऋण मद्धे, जो ऋणी द्वारा उसे वस्तुतः शोध्य और देय है, भले ही उसका प्रत्युद्धरण वादों की मर्यादा-सम्बन्धी तत्समय प्रवृत्त विधि द्वारा वर्जित हो या न हो, उपयोजित किया जा सकेगा।85

उदाहरण के लिए, सिन्डीकेट बैंक बनाम मेसर्स वेस्ट बंगाल सीमेन्ट्स लि. (Syndicate Bank v. M/s. West Bengal Cements Ltd.)86 में वादी बैंक ने प्रतिवादी को दस लाख रुपये का ओवरड्राफ्ट लेने की सुविधा प्रदान की जिसके लिये प्रतिवादी ने एक वचन-पत्र निष्पादित किया। प्रत्येक तीसरे महीने ओवरड्राफ्ट के धन पर ब्याज लगाया जाता तथा इसे मूलधन में जोड़ दिया जाता था। प्रतिवादी ने कई बार उक्त धन की अदायगी के लिये बैंक को धन की कई किश्तें दीं परन्तु निर्देश नहीं दिया कि वह किस ऋण की अदायगी हेतु थीं। न्यायालय ने निर्णय दिया कि प्रतिवादी बैंक को इस बात के लिए विवश नहीं किया जा सकता कि उक्त किश्त मूल धन की अदायगी में उपयोजित की जाये।87

अत: नियम यह है कि व्यक्त निदेशों की अनुपस्थिति में डिक्री धारक भुगतान का विनियोग धारा 60 के अनुसार कर सकता है अर्थात् वह उसे किसी भी ऋण के विनियोग हेतु उपयोजित कर सकता है। यह स्पष्टीकरण उच्चतम न्यायालय ने माठुन्नी मठाई बनाम हिन्दुस्तान आरगेनिक केमिकल्स लि. (Mathunni Mathai v Hindustan Organic Chamicals Ltd.)88 के वाद में किया।

उपर्युक्त निर्णय को हाल में हिमाचल उच्च न्यायालय ने पी० एन० बी० धर्मशाला बनाम प्रेम सागर चौधरी (PNB Dharmshala v Prem Sagar Chaudhary)89 के वाद में लागू किया है।

(3) जहाँ कोई पक्षकार विनियोग नहीं करता है, वहाँ देनगी का उपयोजन–उपर्युक्त दो परिस्थितियों के अतिरिक्त, जहाँ कि कोई पक्षकार कोई विनियोग नहीं करता है, वहाँ देनगी समय क्रमानुसार ऋणों के उन्मोचन के लिए उपयोजित की जायेगी, भले ही वे ऋण वादों की मर्यादा-सम्बन्धी तत्समय प्रवृत्त विधि द्वारा वर्जित हों या न हों। यदि ऋण समकालीन हो तो देनगी अनुपात से प्रत्येक के उन्मोचन के लिए उपयोजित की जायेगी।90 धारा 61 में दिये गये उपर्युक्त उपबन्ध के लागू होने के लिए निम्नलिखित आवश्यक तत्व होने चाहिये-

(क) जहाँ कि ऋणी यह उपदर्शित नहीं करता है कि देनगी किस विशिष्ट ऋण के उन्मोचन के लिए उपयोजित की जाये।

(ख) ऋणदाता देनगी को किसी सुविशिष्ट शोध्य ऋण के उन्मोचन के लिए विनियोग नहीं करता है।

(ग) देनगी समय क्रमानुसार ऋणों के उन्मोचन के लिए उपयोजित की जायगी।

84. ए० आई० आर० 1999 एस० सी० 1036.

85. धारा 60.

86. ए० आई० आर० 1989 दिल्ली 107.

87. तत्रैव, पृष्ठ 116.

88. ए० आई० आर० 1995 एस० सी० 1572 : (1995) एस० सी० सी० 26; न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया ए० आई० आर० 1988 एच० पी० 33 द्वारा प्रतिपादित सही विधि नहीं है।

89. ए० आई० आर० 1996 एस० पी० 86, 89.

90. धारा 61.

(घ) भले ही वे ऋण वादों की मर्यादा-सम्बन्धी तत्समय प्रवृत्त विधि द्वारा वर्जित हों या न हों।

(ङ) यदि ऋण समकालीन हों तो देनगी अनुपात से प्रत्येक के उन्मोचन के लिए उपयोजित की जायेगी।

उपर्युक्त वर्णित धारा 61, इस सम्बन्ध में, अंग्रेजी विधि के समान है। क्लेटन के वाद (Clayton’s Case)91 में यह नियम प्रतिपादित किया गया था कि चालू (Current) लेखे के बारे में यह उपधारणा उत्पन्न होती है कि ऋण नाम (debit) तथा जमा (credit) के कालमों में लिखी धनराशियों का विनियोग इस प्रकार होगा कि एक-दूसरे का उन्मोचन कर दें तथा ऐसा कालानुक्रम (Chronological order) में किया जायगा।

धारा 61 की परिधि (scope) को समझाते हुए मुख्य न्यायाधीश सुलेमान (Sulaiman, C. J.) ने एम० रामनाथ बनाम चिरन्जीलाल (M. Ramnath v. Chiranjilal)92 में कहा था कि जब न तो ऋणी और न ही ऋणदाता ने कोई विनियोग किया हो, तब धारा 61 के अधीन न्यायालय का कर्तव्य है कि देनगी को ऋणों के उन्मोचन के लिए समय के क्रम में उपयोजित करे और यदि ऋण समकालीन है तो प्रत्येक का आनुपातिक उन्मोचन करे । न्यायालय के शब्दों में “. …………when neither the debtor nor the creditor has made any appropriation, then under section 61 it is the duty of the court to apply the payment in discharge of the debts in order of time, and if the debts are of equal standing, in discharge of each proportionately.”

हाल के मद्रास के वाद ए० रामावेल बनाम पाण्ड्यन आटोमोबाइल्स प्राइवेट लि0 (A. Ramavel v. M/s Pandyan Automobiles Pvt. Ltd.)93 में मद्रास उच्च न्यायालय ने अपने निर्णय में क्लेटन के वाद (Clayton’s case) में प्रतिपादित नियम का अनुमोदन करते हुए धारित किया कि खुले लेखे (open account) में पहले ऋण की धनराशि पहली जमा की धनराशि से मुजरा (set-off) होगी (“first debt entry will be set-off by the first credit entry)”94 इस वाद में वादी प्रतिवादी को सामग्रियाँ उधार पर दिया करता था तथा हर महीने उसके लेखे में लिख देता था। प्रतिवादी ने 653 रुपये की धनराशि की देनगी की, परन्तु वादी ने उसे विनियोग नहीं किया। न्यायालय ने निर्णय दिया कि ऋण की पहली धनराशि का पहली जमा की धनराशि से मुजरा किया जाय।

परन्तु इस नियम को उच्चतम न्यायालय ने परिवर्तित कर दिया है तथा धारित किया है कि किसी एक ऋण पर ब्याज को एक पृथक ऋण नहीं कहा जा सकता है।95

91. (1816)1 मर० 572.

92. ए० आई० आर० 1935 इलाहाबाद 221, 227.

93. ए० आई० आर० 1973 मद्रास 359.

94. तत्रैव, पृ० 360..

95. देखें : इन्डस्ट्रियल क्रेडिट एण्ड डेवलपमेन्ट सिन्डीकेट बनाम स्मितावेन एस० पटेल, ए० आई० आर० 1999 एस० सा० 1036%3; (1999)3 एस०सी० सी० 80, 86.

Follow me at social plate Form